Saturday, May 7, 2011

संकल्प


मन चाहता ऊंची उड़ान भरूँ
हंसों की कतारों में मिल उडूं
निकल जाऊं बादलों के पार 
नभ से तकरार करुँ
बालक सी रार करुँ
गगन पर मचल मचल
मेघों की जलधार में
डुबकी लगाऊँ
जी भर नहाऊं
अम्बर  से कल्पना के
अंबार समेट कर
उतार धरूँ धरा पर
गीतों में मधुरस भर
कवितायें रसवंती
गाऊँ बन कोकिल-कंठी 
बेड़ियों से मुक्ति का सन्देश
बना लूं एक मन चाहा परिवेश 
चीर दूं तमस को
फैला दूं सर्वत्र उजास 
प्रकाश में विसर्जन करुँ 
अंतस का संत्रास 
गीतों में मल मल
धो डालूँ सारा संताप 
रच दूं स्वयं का नया इतिहास 
असीर की पीर सोख 
नव-युग का सूत्रपात ! 
  

"सूरज आया"



कौन आया?
सूरज आया, 
क्या लाया?
उजाला लाया|१|
--
उठो, उठो,
भोर हुई,
जल्दी करो,
रात गई|२|
--
मुह हाथ धोओ,
पेट साफ करो,
ठंडा/कुनकुना नहाओ,
और ईश का ध्यान करो|३|
--
खाना खाओ,
खाली पेट न यूँ घुमो,
फिर अपने काम लगो,
लगन से उसमे रामो|४|
--
घर आओ,
अब दिन ढला,
नीड़ हमारा है,
सबसे भला|५|
--
दीप-बाती आओ जला ले,
ईश वंदना करें,
हे प्रभु,हे कृपालु,
तू संताप हरे|६|
--
भूख लगी,
अब खाना खाए,
धन्यवाद कर,
प्रभु के गुण गए|७|
--
राम भला हो,
अब नीद सताएं,
सुंदर सपनों में,
अब खो जाये|८|
--
उठो कोई आया है,
कौन आया?,
सूरज आया,
उजाला लाया|९|

मैं अपनी माँ से दूर


मैं अपनी माँ से दूर अमेरिका में रहता हूँ

बहुत खुश हूँ यहाँ मैं उससे कहता हूँ
हर हफ़्ते
मैं उसका हाल पूछता हूँ
और अपना हाल सुनाता हूँ
सुनो माँ,कुछ दिन पहले
हम ग्राँड केन्यन गए थे
कुछ दिन बाद
हम विक्टोरिया-वेन्कूवर जाएगें
दिसम्बर में हम केन्कून गए थे
और जून में माउंट रेनियर जाने का विचार है
देखो  माँ,ये कितना बड़ा देश है
और यहाँ देखने को कितना कुछ है
चाहे दूर हो या पास
गाड़ी उठाई और पहुँच गए
फोन घुमाया
कम्प्यूटर का बटन दबाया
और प्लेन का टिकटहोटल आदि
सब मिनटों में तैयार है
तुम आओगी  माँ
तो मैं तुम्हे भी सब दिखलाऊँगा
लेकिन
यह सच नहीं बता पाता हूँ कि
20 
मील की दूरी पर रहने वालो से
मैं तुम्हें नहीं मिला पाऊँगा
क्यूंकि कहने को तो हैं मेरे दोस्त
लेकिन मैं खुद उनसे कभी-कभार ही मिल पाता हूँ
माँ खुश है कि
मैं यहाँ मंदिर भी जाता हूँ
लेकिन
मैं यह सच कहने का साहस नहीं जुटा पाता हूँ
कि मैं वहाँ पूजा नहीं
सिर्फ़ पेट-पूजा ही कर पाता हूँ
बार बार उसे जताता हूँ कि
मेरे पास एक बड़ा घर है
यार्ड है
लाँन में हरी-हरी घास है
 चिंता है
 फ़िक्र है
हर चीज मेरे पास है
लेकिन
सच नहीं बता पाता हूँ कि
मुझे किसी  किसी कमी का
हर वक्त रहता अहसास है
 काम की है दिक्कत
 ट्रैफ़िक की है झिकझिक
लेकिन हर रात
एक नए कल की
आशंका से घिर जाता हूँ
आधी रात को नींद खुलने पर
घबरा के बैठ जाता हूँ
मैं लिखता हूँ कविताएँ
लोगो को सुनाता हूँ
लेकिन
मैं यह कविता
अपनी माँ को ही नहीं सुना पाता हूँ
लोग हँसते हैं
मैं रोता हूँ
मैं अपनी माँ से दूर अमेरिका में रहता हूँ
बहुत खुश हूँ यहाँ मैं उससे कहता हूँ

Thursday, March 31, 2011

तुम्हारी और मेरी आवाज़


तुम्हारी आवाज़,
आज तुमने मुझसे पूछा कि मुझे तुम्हारी आवाज़ कैसी लगती है,
तो सुनो,
तुम्हारी आवाज़ मुझे दुनिया की सबसे मीठी आवाज़ लगती है,
जब जब तुम बोलती हो,
खाना बन गया है,
तुम आराम करो,
लाओ मैं तुम्हारे पैर दबा दूं,
मुझे लगता है की मेरे कानों में शहद घोल रही हो तुम्हारी आवाज़.

जब जब तुम बोलती हो,
तुम्हारे कपड़े प्रेस हो गए हैं,
मैंने तुम्हारा कमरा ठीक कर दिया है,
ये लो अपना टिफिन,
मुझे लगता है, क्या तुमसे मीठी हो सकती है कोई भी आवाज़,

पर न जाने क्यों मुझे कड़वी लगने लगती है तुम्हारी आवाज़,
जब जब तुम कहती हो,
बर्तन माँज दो,
कपड़े ले आओ ड्रायर से,
बच्चे का डायपर बदल दो,
मैं परहेज़ करता हूँ ऐसी आवाजें सुनने से.

जब जब तुम आदेश देती हो,
टेबल पोंछ दो,
चलो मेरे साथ बाज़ार,
भर दो सारे बिल,
मेरे कान पकने लगते हैं,

कोशिश करना कि तुम्हारी आवाज़ की मिठास सदा उसकी कड़वाहट पर भारी रहे,
ताकि मुझे सदा मीठी लगती रहे,
तुम्हारी आवाज़,

वैसे तुमको मेरी आवाज़ कैसी लगती है?
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मेरी आवाज़,
मेरे एक ज़रा से प्रश्न के उत्तर में,
तुमने अपनी पूरी मानसिकता उडेल कर रख दी,
फिर भी मुझे नहीं बताया,
कि मेरी आवाज़ तुम्हें लगती कैसी है,

मैं बताती हूँ,
कि मुझे तुम्हारी आवाज़ कैसी लगती है,
सुनो,

मुझे तुम्हारी आवाज़ बहुत मीठी लगती थी,
जब शादी से पहले,
तुम किया करते थे उच्च आदर्शों की बातें,
कहा करते थे की स्त्री और पुरुष में फर्क नहीं करते हो,
मेरी हर ग़लती को कोई बात नहीं कह कर टाल दिया करते थे,
मुझे लगता था,
ये आवाज़ तो मैं अपने जीवन भर सुन सकती हूँ,

मुझे आज भी कभी कभी अच्छी लगती है तुम्हारी आवाज़,
जब सुबह सुबह तुम मुझे जगाते हुए कहते हो, चाय पी लो,
जब बिना कहे मुन्ने को कर देते हो तैयार,
मेरे खाना खाते समय जब तुम मेरे पास बैठ जाते हो बिना किसी मान मनौवल के,
तब तब मेरे कानों में मिसरी घोल जाती है तुम्हारी आवाज़,

लेकिन,
न जाने क्यों,
मुझे ज्यादातर कड़वी लगने लगी है,

जब जब तुम कहते हो,
मैं तुम्हारी कोई मदद नहीं कर सकता,
ये क्यों खरीदना है,
मेरे पास तुमसे बातचीत करने का समय नहीं है,
मुझे दुखी कर जाती है तुम्हारी आवाज़,

मुझे लगती है ज़हरीली,
जब तुम बनाते हो बहाने,
मुझको देते हो ताने,
मेरे मायके को कुछ बोलते हो जाने अनजाने,
मुझे लगता है,
मैं और नहीं सुन सकती,

क्या तुम कोशिश करने को तैयार हो,
ताकि मुझे तुम्हारी आवाज़ हमेशा मीठी लगे.

SATYAM SRIVASTAVA
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वह समाज मर जाता है जिसकी कविता डरती है


सुनते हैं कवि अपने युग का सच्चा प्रतिनिधि होता,

युग के हंसने पर कवि हंसता युग रोता कवि रोता,

कविता कवि के भाव जगत का चित्र हुआ करती है,
सच्चे कवि की कविता सच्चा मित्र हुआ करती है,

कविता वैभव के विलास में संयम सिखलाती है,
घोर निराशा में भी कविता आशा बन जाती है,

युग की सुप्त शिराओं में कविता शोणित भरती है,
वह समाज मर जाता है जिसकी कविता डरती है,

हृदय सुहाते गीत सुनाना कवि का धर्म नहीं है,
शासक को भी दिशा दिखाए कवि का कर्म यही है,

अपने घर में रहने वाला जब आतंक मचाए,
घर का मालिक ही घर में जब शरणार्थी बन जाए,

बहन बेटियों अबलाओं की लाज ना जब बच पाए,
मज़हब का उन्माद भाईचारे में आग लगाए,

जब सच को सच कहने का साहस समाप्त हो जाए,
दूभर हो जाए जीना विष पीकर मरना भाए,

तब कविता नूतन युग का निर्माण किया करती है,
निर्बल को बल प्राणहीन को त्राण दिया करती है,

कविता जन जन को विवेक की तुला दिया करती है,
कविता मन मन के भेदों को भुला दिया करती है,

'दिनकर' की है चाह कि हम सब भेदभाव को भूलें,
मात भारती की गरिमा भी उच्च शिखर को छू ले।

कविः डा वागीश दिनकर

Saturday, March 5, 2011

एक बेनाम महबूब के नाम



चाहता हूँ कि तेरा रूप मेरी चाह में हो
तेरी हर साँस मेरी साँस की पनाह में हो

मेरे महबूब तेरा ख़ुद का ज़िस्म न हो
मेरे एहसास की मूरत कोई तिलिस्म न हो

ढूँढता फिरता हूँ हर सिम्त भुला के ख़ुद को
अपनी पोशीदा रिहाइश का पता दे मुझको

तुझसे मिलने की क़सम मैंने नहीं तोड़ी है
दिल ने उम्मीद बहरहाल नहीं छोड़ी है

तुझको पाने का अभी मुझको इख़्तियार नहीं
पर मेरा इश्क़ कोई रेत की दीवार नहीं

बावफ़ा अब भी हूँ पर मेरी कहानी है अलग
मेरी आँखें हैं अलग आँख का पानी है अलग

अब न मज़बूरी-ओ-दूरी का गिला कर मुझसे
यूँ नहीं है तो तसव्वुर में मिला कर मुझसे

मेरे महबूब तू इक रोज़ इधर आयेगा
हाँ मगर वक़्त का दरिया तो गुज़र जायेगा

तब न शाख़ों पे कहीं गुल नही पत्ते होंगे
जा-ब-जा बिखरे हुये बर्फ़ के छत्ते होंगे

एक मनहूस सफ़ेदी यहाँ फैली होगी
चाँदनी अपनी ही परछाई से मैली होगी

तब भी ज़ज़्बात पे हालात का पहरा होगा
वक़्त इक फीकी हँसी पर कहीं ठहरा होगा

पस्त-कदमों से तू चलता हुआ जब आयेगा
सर्द-तूफ़ान के झोकों से सिहर जायेगा

मेरे अल्फ़ाज़ में तब भी यही नरमी होगी
और मेरे कोट में अहसास की गरमी होगी

Thursday, March 3, 2011

कोशिश करने वालों की


लहरों से डर कर नौका पार नहीं होती,
कोशिश करने वालों की कभी हार नहीं होती।
नन्हीं चींटी जब दाना लेकर चलती है,
चढ़ती दीवारों पर, सौ बार फिसलती है।
मन का विश्वास रगों में साहस भरता है,
चढ़कर गिरना, गिरकर चढ़ना न अखरता है।
आख़िर उसकी मेहनत बेकार नहीं होती,
कोशिश करने वालों की कभी हार नहीं होती।
डुबकियां सिंधु में गोताखोर लगाता है,
जा जा कर खाली हाथ लौटकर आता है।
मिलते नहीं सहज ही मोती गहरे पानी में,
बढ़ता दुगना उत्साह इसी हैरानी में।
मुट्ठी उसकी खाली हर बार नहीं होती,
कोशिश करने वालों की कभी हार नहीं होती।
असफलता एक चुनौती है, इसे स्वीकार करो,
क्या कमी रह गई, देखो और सुधार करो।
जब तक न सफल हो, नींद चैन को त्यागो तुम,
संघर्ष का मैदान छोड़ कर मत भागो तुम।
कुछ किये बिना ही जय जय कार नहीं होती,
कोशिश करने वालों की कभी हार नहीं होती।
- हरिवंशराय बच्चन (Harivansh Rai Bachchan) (few people think that it is from सूर्यकांत त्रिपाठी "निराला")